MUSIC- THE FOOD OF SOUL

।। संगीत आत्मा का भोजन ।।

संगीत को आत्मा का भोजन इसलिए कहा जाता है क्यूंकि इसकी धुनें चाहें गीतों के साथ हों या अकेले ही वाद्य यंत्रो से निकल कर वातावरण में गूंजे हर हाल में मन और आत्मा दोनों को ही तृप्ति प्रदान करती हैं। यद्यपि संगीत और गीत दोनों ही एक दुसरे के पूरक हैं क्यूंकि संगीत की अकेली धुनें भले ही मन को तरंगित कर दें परन्तु वहां गीतों का अभाव सदा ही खलता है और इसी प्रकार कोई भी गीत चाहें कितने भी मधुर कंठ वाले गायक के द्वारा गया जा रहा हो बिना संगीत के उस गीत का श्रृंगार अधूरा ही रहता है। सच्चे अर्थों में तो पूर्ण संगीत सुर और गीतों के संगम को ही कहा जाता है किन्तु इस सत्य से भी कभी इंकार नहीं किया जा सकता है कि संगीत का प्रभाव सदा ही गीत की तुलना में अधिक प्रभावशाली होता है।


आप यदि गीत-संगीत सुनने के शौकीन हैं तो आप कोई भी धुन बिना किसी गीत के जयादा समय तक सुन सकते हैं और उन धुनों का अनुकरण करते हुए गुनगुना भी सकते हैं और यदि आप एक गायक हैं तो उन धुनों में अपने किसी गीत की रचना को समायोजित कर सकते हैं लेकिंन दूसरी और बिना संगीत की धुनों के कितने भी अच्छे गीत को बहुत अधिक समय तक पूर्ण रूचि के साथ नहीं सुन सकते। 

       कहते हैं कि संगीत की धुनों में ईश्वर का वास होता है। क्यूंकि जब भगवान् श्री कृष्णा अपने बाल्यकाल में गायों को चराते समय वन में अपनी मुरली को बजाते थे तब उससे निकलने वाली संगीत की मधुर धुनें केवल गायों को बल्कि संपूर्ण गोकुल वासियों के हृदय को भाव विभोर कर कर देती थीं।  पूरा का पूरा नंदगांव अपने नन्हे राजकुमार की बांसुरी की धुनों में खो जाता था।

यद्यपि इस सत्य से कभी भी इंकार नहीं किया जा सकता कि किसी भी प्रकार के संगीत की धुन सदा ही प्रत्येक व्यक्ति पर एक सामान प्रभाव डालती हो।  संगीत का प्रभाव सदा ही काल और परिस्थितियों के अनुरूप प्रत्येक श्रोता के लिए अलग अलग होता है जो कि श्रोता की रूचि और उसके समक्ष उस समय की अनुकूल या प्रतिकूल परिस्तिथियों के अनुसार ही अपना प्रभाव छोड़ता है, जैसे कि मान लीजिये कि किसी स्थान पर भगवान् की कथा का आयोजन हो रहा हो और उस समय यदि कथावाचक के द्वारा भगवान् के जन्म, विवाह आदि  का संगीतमय वर्णन चल रहा हो तो ऐसी स्तिथि में वहां उपस्तिथ सभी श्रोताओं के हृदय में लगभग एक जैसे भाव ही उत्पन्न होंगे किन्तु यदि कथा के स्थान पर ये किसी विवाह समारोह का  आयोजन हो तो वहां अलग-अलग अवसर  पर जब भी उस अवसर की स्तिथियों या रस्मों के अनुसार कोई भी संगीत की धुन या गीत संगीत के बजाये जाने पर उसका प्रभाव वहां उपस्तिथ सभी श्रोताओं पर उनकी आयु, रूचि और वर अथवा वधु से उनके सम्बन्ध की गहराईयों के अनुसार ही पड़ेगा।  जैसे कि वरमाला के समय यदि स्वागत गीत " बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है " को गाया जाता है या केवल उसकी धुन ही बजाई जाती है तो ये गीत और संगीत का संगम उस पल दुल्हन के दिल में एक प्यार का भाव उत्पन्न करेगा जो वहां हाथ में वरमाला लिए मंच पर अपने जीवनसाथी का पलकें बिछाएं इन्तजार कर रही है और वहीँ दूसरी और ये गीत या धुन दूल्हे के दिल में एक गर्व का भाव उतपन्न करेगी कि उसकी होने वाली जीवन संगिनी अपने हाथों में माला लिए हुए उसका स्वागत कर रही है और उसके आने पर अपने दिल के भावों को गीत के माध्यम से प्रस्तुत कर रही है। लेकिन यही गीत उस पल वहां उपस्तिथ अन्य सभी लोगों के दिल में उनके अपने अपने व्यक्तिगत कारणों  के अनुसार भाव या आनंद उत्पन्न करेगी।



संगीत की धुनों में इतनी शक्ति होती है कि वो अपने प्रभाव से किसी भी व्यक्ति को हँसा भी सकती हैं और रूला भी सकती हैं।  संगीत आपके उदास चेहरे पर मुस्कराहट भी ला सकता है और आँखों में आंसुओं का सैलाब भी।  बस ये सब व्यक्ति के उन धुनों के साथ संबंधों पर ही निर्भर करता है कि वो धुनें उसे रुलायेंगी या हँसायेंगी। कोई प्रेम गीत किसी प्रेमी के हृदय को प्रफुल्लित कर देता है तो किसी ऐसे शक्श को रुला भी सकता है जिसका प्रेम पूर्ण हो पाया हो अथवा उसका प्यार अब उसके साथ हो। किन्तु इस सत्य से कभी भी इंकार नहीं किया जा सकता कि उस एक ही प्रेम गीत ने या किसी एक ही संगीत की धुनों ने उन दोनों ही लोगों की आत्मा को तृप्त किया हो।  एक ने उस गीत को सुनकर अपनी प्रेमिका के साथ उन प्रीत भरे पलों की कल्पना करते हुए आनंद मनाया हो और दुसरे ने उसी गीत को सुनते हुए अपनी बिछड़ी हुई प्रियतमा को याद करते हुए अपने नैनों से रो-रो कर ढेर सारे आंसू बहाये हों। किन्तु चैन दोनों ने ही पाया सुकून दोनों को ही मिला।

    अतः इस तथ्य से कभी भी इंकार नहीं किया जा सकता कि संगीत आत्मा का भोजन है।

                                              ।।  जय श्री श्याम प्रभु।।


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